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Pranav Prateek



प्रणव प्रतीक की कविताएँ


ये कांपते हाथ

टूटी - फूटी कटोरी मेंझनझनातेचदं सि क्के
कांपतेपरैों पे, घि सेदांतों सेनि कलती कराह
सफेद उलझेबाल, लटकती झर्रिुर्रियों सेगाल
आसं ूभरेनि गाहों को फैलात,े येकांपतेहाथ
हफ्तों की भखू सेतड़पती, सखू ती अतं ड़ि यां
अधमरी गोश्त मेंबदलत,े ढलतेशरीर के ढांचे
खोखली और दि खावटी रि श्तों के छूटतेसाथ
दि न दोपहर नि वालेको तरसत,े येकांपतेहाथ
जतन की परवरि श और लगाव का उपहार
आश्रम के खर्च तलेदबा हर आभार-उपकार
महीनों, फि र सालों बाद नजर आए औलाद
लटुेबढ़ुापेमेंभी दआु ऐं देत,े येकांपतेहाथ
नाजों सेपाला, जि सेपलकों पर बि ठाया था
भरी सभा कीमत लगा आए उसकी जि दं गी
आखं समदंुर टपकात,े कन्यादान करतेहाथ
अपना कलेजा नि काल सौंपत,े येकांपतेहाथ
भरी दोपहरी मजदरूी, रात पहरेदारी का काम
बच्चों की हरेक ख्वाहि शों को परूा करता बाप
तीन पहर की थकी कोशि शों सेचलतेघरबार
खदु भखू ेरह घर का पेट भरत,े येकांपतेहाथ
हर शहर, हर मोहल्ले, हर घर की दबी दास्तान
कहींपछतावेतो कहींउम्मीद मेंबीत चकुे साल
कि स चमत्कार को ढूंढती समाज की हर नजर?
यहां-वहा,ं हर जगह दि ख जात,े ये कांपते हाथ।







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